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चालीस साल



चालीस साल
आज तुमसे मिले चालीस साल हो गए
अब तो तुम्हारे सारे बाल सफ़ेद हो गए,
पर तुम अब भी वैसी हो,
जैसे तुम तब थी और मेरे साथ पढ़ती थी,
एकदम भोली,सीधी-साधी गुपचुप सी अब भी रहती हो,
हर बात को अब भी धीरे-धीरे कहती हो,
अब तो अपने बच्चों को तुम गणित पढ़ाती हो,
उनके न समझने पे बिल्कुल वैसे ही समझाती हो,
सवालों को अब भी हल करने की जगह,उन्हें बनाती हो,
कुछ बात कही,कुछ बात सुनी,बस सुन के हौले से मुस्काती हो,
सुनो,तुम बिल्कुल नहीं बदली,
अब भी तुम फिर से उसी बैच के साथ बीएससी करना चाहती हो,
क्या अब भी "बहुत याद आ रही है या मूड ऑफ है का बहाना बनाती हो..
तुम बिल्कुल नही बदली,वैसी ही हो जैसे तुम मेरे साथ पढ़ती थी..

© शैलेश

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