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सांझ हो गई


साँझ हो गयी
ढलती शाम भी गुजर रही है दबे पांव,
कोई थका माँदा लौट रहा होगा घरौंदे को।
भूखा-प्यासा ,दिन भर धूप में तपा हुआ,
क़दमों की रफ़्तार मंद हो रही होगी,
मन मचल रहा होगा,घर जल्दी पहुंचने को,
साँझ हो गयी!
कोई थका मांदा लौट रहा होगा घरौंदे को।
घर पहुंचेगा क्या क्या कहेगा,
बीवी को सब्जी का थैला देगा,
बच्चों को जेब में रखी टॉफी देगा,
थक हार के चारपाई पे औंधे मुँह पड़ जायेगा,
कोई पूछा तो बहुत थक गया है वो ऐसा कह देगा,
सब कुछ  मन मे चल रहा होगा,
साँझ हो गयी!
कोई मजबूर लौट रहा होगा घरौंदे को।
किससे थका इस व्यवस्था से लड़ते लड़ते,
या फिर रोज वही मजबूरी सहते सहते।
आज भी उसको पूरी मजदूरी नही मिली,
रोज की तरह उसकी साँझ हो चली,
बीवी बच्चे सब राह देख रहे होंगे,
घर का चूल्हा भी उसके इंतेज़ार में होगा,
गाय खड़ी पुकार रही होगी हौदे पे,
साँझ हो गयी!
कोई थका हारा लौट रहा होगा अपने घरौंदे को।
      ©शैलेश

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