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साकी विग्रह - भाग २

साकी चली जाती है, 
उसकी सिर्फ़ आवाजें सुनता हूँ,
लिखने की कोशिश करता हूँ,
लेकिन उसके जाने मात्र से मेरे शब्द रूठ जाते हैं,
मात्रा मुँह फेर लेती है,
कागजों पे सिलवटें उभर आती हैं,
क़लम भारी होके चलने से इंकार कर देती है..
निःशब्द सा हो जाता हूँ मै, मन कचोटने लगता है। 
इस निशांत जीवन की दौड़ में अकेला सा रह जाता हूँ.
रात काटने दौड़ती है, अंधकार तैयार हो जाता है निगलने को,
लेकिन उसकी कुछ यादें,
वो उसके साथ बिताए कुछ लम्हे याद आते हैं.
उनमें हुई बातों के आधे-अधूरे वाक्य, खनकती हंसी,
उसका कभी गुस्सा करना या
किसी बात पे चिढ़ जाना सब याद आते हैं एक साथ।
फ़िर वो अचानक इस मंथन में फिर से शामिल होने आ जाती है,
लेके हाथों में हाला सारा ध्यान तोड़ जाती है.
शायद उसका आना ही मुझे उन सबसे बाहर निकाल देता है।
                                                            - शैलेश

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