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कैसे किया होगा?


 कैसे उसने वो अपने अंतिम छण का दर्द बर्दाश्त किया होगा?
जब फंदा कसने लगा होगा,
सांस अटकने लगी होगी,
मौत भी उसको प्रत्यक्ष दिखने लगी होगी,
दर्द हर हद से आगे गुजरने लगा होगा,
उसने इतना असहनीय दर्द कैसे सहा होगा!
गर्दन की हर नस अकड़ने लगी होगी,
मस्तिष्क तक रुधिर गति शिथिल पड़ने लगी होगी,
सांसें एकदम मन्द चलने लगी होगी,
एक बार तो उसका मन उस दर्द से बाहर निकलने का तो हुआ होगा?
इतना असहनीय दर्द उसने कैसे सहा होगा!

संसार और समय की गति से परे शरीर जाने लगा होगा,
यमपाश उसकी आत्मा को कसने लगा होगा,
समस्त जीवन की यादों का कोलाहल उसको यूँ ही डसने लगा होगा,
उसने गर्दन को फंदे में क्यूँ रखा होगा...
उसने इतना सब कैसे सहा होगा?

 बस यही सवाल सब कर रहे हैं,
न्यूज चैनल न जाने कितने दिनों से बेवज़ह बहस कर रहे हैं..
जाने कब तक ये लोग किसी की मौत को भी चर्चा का विषय बनाते रहेंगे,
जाने कब ये निष्ठुर लोग अपनी ये नीच हरक़त बन्द करेंगें।
अगर उसकी आत्मा देख रही होगी,
वो भी अपने किये पे अफसोस कर रही होगी,
लोग उसकी आत्महत्या को भी मुद्दा बना डाले हैं,
इस लोकतंत्र के खेल भी निराले हैं।
ये भी एक दर्द है जैसे तैसे उसने सहा होगा..
वो अंतिम छण उसने सब कैसे सहा होगा!!
© शैलेश

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